बिहार में “सूखा नशा”: परसा बाजार और आसपास के गांवों से उभरती तस्वीर

Author: Pratima Kumari

पिछले कुछ वर्षों से पटना जिले के परसा बाजार और उसके आसपास के गांवों में काम करते हुए एक बात लगातार सामने आ रही है। गांवों में “सूखा नशा” कहे जाने वाले नशीला पदार्थों का इस्तेमाल पहले की तुलना में अधिक दिखाई देने लगा है। स्थानीय परिवार, सामाजिक कार्यकर्ता और समुदाय के लोग बताते हैं कि किशोरों और युवाओं के बीच स्मैक, नशीली गोलियों, इंजेक्शन और दूसरे पदार्थों की पहुंच बढ़ी है।

गांवों में बातचीत के दौरान कई परिवारों ने बताया कि बच्चों की शुरुआत अक्सर खैनी, तंबाकू या दूसरे हल्के नशों से होती है। लेकिन धीरे-धीरे कुछ बच्चे अधिक खतरनाक पदार्थों तक पहुंच जाते हैं। कई माता-पिता ने कहा कि शुरुआत में उन्हें समझ ही नहीं आया कि बच्चे किस तरह की लत में फंस रहे हैं।

फील्ड में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस भयावह स्थिति को केवल “अपराध” या “व्यक्तिगत गलती” के रूप में देखना गलत होगा। गांवों से जो जमीनी हकीकत उभरती है, वह सीधे तौर पर बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा, जातिगत भेदभाव, बदहाल शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के लिए सीमित अवसरों से जुड़ी हुई है।

शराबबंदी के बाद गांवों में क्या बदला?

बिहार में साल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद ग्रामीण परिवारों, विशेषकर महिलाओं ने घरेलू हिंसा में कमी और आर्थिक बचत के रूप में एक बड़ी राहत महसूस की थी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में यह राहत एक नई आपदा में बदल गई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के अनुसार, शराब की अनुपलब्धता के कारण अब बेहद खतरनाक सिंथेटिक और रासायनिक नशे गांवों की गलियों तक पहुंच चुके हैं।

इस बदलाव की पुष्टि सरकारी और प्रामाणिक आंकड़े भी करते हैं। The Indian Express में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में एनडीपीएस एक्ट (NDPS Act) के तहत दर्ज मामलों की संख्या साल 2016 में महज 518 थी, जो 2024 तक बढ़कर 2,411 हो गई। रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों के हवाले से स्पष्ट कहा गया है कि शराबबंदी के बाद राज्य में स्मैक, ब्राउन शुगर और अन्य मादक पदार्थों का अवैध इस्तेमाल और तस्करी तेजी से बढ़ी है।

जाति और गरीबी के बढ़ते सूखे नशे के सेवन से क्या संबंध है? 

फील्ड में बातचीत के दौरान एक बात बार-बार सामने आई कि इस समस्या का असर सभी समुदायों पर समान रूप से नहीं पड़ रहा। जिन परिवारों ने अपने बच्चों को नशे की समस्या से जूझते देखा, उनमें बड़ी संख्या दलित, महादलित और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की है।

इन परिवारों का कहना है कि उनके इलाकों में रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं, स्कूलों की स्थिति कमजोर है और कई परिवारों की आर्थिक हालत ऐसी नहीं होती कि वे बच्चों की पढ़ाई लगातार जारी रख सकें। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, उन्हें कई बार जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। युवाओं के बीच भविष्य को लेकर असुरक्षा और अनिश्चितता का भाव भी गहरा है, जबकि सरकारी सहायता और संस्थागत सहयोग तक पहुंच आसान नहीं है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे सामाजिक और आर्थिक माहौल में कई युवाओं के भीतर असहायता और निराशा की भावना विकसित होने लगती है। उनका मानना है कि यही परिस्थितियां युवाओं को नशे की तरफ अधिक संवेदनशील बनाती हैं, और अवैध ड्रग नेटवर्क अक्सर ऐसे ही इलाकों को अपना आसान लक्ष्य बनाते हैं। 

Roundtable India की एक राष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, दलित युवाओं में बेरोजगारी की दर हमेशा से देश के औसत से काफी ज्यादा रही है। आज फॉर्मल सेक्टर (पक्की और सुरक्षित नौकरियों) में दलितों की हिस्सेदारी सिर्फ 6.5% रह गई है। इस वजह से एक बहुत बड़ी आबादी को मजबूरी में बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के, बेहद कम पैसों वाली थका देने वाली दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ती है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जाति और गरीबी यहां अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं। जिन परिवारों के पास जमीन, स्थायी आय, शिक्षा या सामाजिक सहयोग कम है, उनके बच्चों के लिए नशे के जाल में फंसने का खतरा अधिक हो जाता है। उनका यह मानना है की, इन समुदायों के युवाओं में नशे की लत कोई शौक या मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह व्यवस्थागत भेदभाव और हताशा से भागने की एक तड़प है। साथ ही, यह दिनभर की कमरतोड़ मजदूरी से होने वाले शारीरिक दर्द को भुलाने की एक मजबूर और आत्मघाती कोशिश भी है। और उनके लिए नशे से बाहर निकलना और भी मुश्किल हो जाता है।

किशोरों पर बढ़ता असर और पुनर्वास की चुनौतियां: जमीनी हकीकत

परसा बाजार और आसपास के गांवों में काम करने वाले लोगों का कहना है कि 13 से 18 साल के किशोर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई परिवारों ने बताया कि बच्चों का पहला संपर्क दोस्तों के जरिए या स्कूल के आसपास हुआ।

शुरुआत में परिवारों को बदलाव मामूली लगे। बच्चे घर से पैसे मांगने लगे, पढ़ाई में रुचि कम हो गई, देर रात तक बाहर रहने लगे या घर का सामान बेचने लगे। बाद में कई परिवारों को समझ आया कि बच्चे गंभीर लत में फंस चुके हैं।

साल 2020 में परसा बाजार में सूखे नशे के ओवरडोज से पहली मौत दर्ज हुई, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया. इसके बाद से अब तक दर्जनों बच्चों की जान जा चुकी है। स्थिति यह है कि आज इन ग्रामीण इलाकों में हर पांच-छह घरों में से एक परिवार इस संकट से सीधा प्रभावित है

इस संकट से निपटने के रास्ते भी बेहद मुश्किल हैं। गाव में किशोरों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता, काउंसलिंग, खेलकूद या सामुदायिक सहयोग जैसी बुनियादी सुविधाएं लगभग ना के बराबर हैं। निजी नशा मुक्ति केंद्रों का खर्च उठाना गरीब परिवारों के बस के बाहर है। बच्चों के इलाज के लिए कई परिवारों को जमीन या घर गिरवी रखना पड़ा है, तो कइयों ने माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से भारी ब्याज पर कर्ज लिया है।

इसके अलावा, कुछ परिवारों और युवाओं ने नशा मुक्ति केंद्रों के भीतर बेहद अमानवीय व्यवहार और जातिगत भेदभाव का सामना करने के अनुभव बताए है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इलाज या केंद्र से लौटने के बाद भी गांवों का माहौल और नशे की उपलब्धता वैसी ही बनी रहती है, जिसके कारण युवा दोबारा उसी लत का शिकार हो जाते हैं।

निष्कर्ष: पुलिसिंग नहीं, सामाजिक न्याय से निकलेगा समाधान

परसा बाजार और उसके आस-पास के गांवों के अनुभव यह साफ करते हैं कि “सूखा नशा” सिर्फ एक कानून-व्यवस्था या पुलिस की कार्रवाई का मामला नहीं है। यह समाज में गहराई से पैठी बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जातिगत भेदभाव और सार्वजनिक संस्थाओं की विफलता का नतीजा है।

विडंबना यह है कि गरीब और दलित युवाओं को समाज और पुलिस दोनों बहुत जल्दी ‘अपराधी’ या ‘समस्या’ के रूप में चिह्नित कर देते हैं। इससे पीड़ित परिवार पुलिस या प्रशासन के पास जाने से भी डरते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि उनके बीमार बच्चे को मदद मिलने की बजाय जेल भेज दिया जाएगा। दूसरी ओर, उन बड़े सप्लायरों और संगठित सिंडिकेट्स पर बहुत कम ध्यान जाता है जो इन घातक पदार्थों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं।